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राजी जनजाति |raji tribe |
राजी
'राजी' जनजाति भी उत्तराखण्ड की एक जनजाति है. इस जनजाति को 'बनरौत' के नाम से भी जाना जाता है. यह
जनजाति पिथौरागढ़ जिले के धारचूला एवं डीडीहाट विकास खण्डों के किमखोला, चिपलयड़ा, गानागाँव, चौरानी तथा जमतड़ी आदि गाँवों में निवास करती है.
बंशज
में गंगा पठार के पूर्व से मध्य नेपाल प्रागैतिहासिक तक का क्षेत्र आग्नेय वंशीय कोलविरात जातियों का है. इनके
वंशजों को आजकल 'राजी' कहा जाता है, राजी मुख्य रूप से जंगलों में रहना पसन्द करते हैं.
धार्मिक विश्वास
अशिक्षित होने के कारण राजी जनजाति के लोग अन्धविश्वासी हैं. जंगलों में रहने के कारण ये लोग जंगल के देवता की पूजा करते हैं. 'वाघनाथ' इनके प्रमुख देवता हैं. जादू-टोना, भूत प्रेत में इनका विश्वास है. ये हिन्दू धर्म को मानते हैं.
वेशभूषा
राजी जनजाति के लोग थारू पुरुष लंगोटी की तरह धोती तथा अंगरखा पहनते हैं. ये बड़ी-बड़ी चोटी भी रखते
हैं. महिलाएँ रंगीन लहँगा, चोली तथा ओढ़नी पहनती हैं. इन्हें गोदना गुदवाने का विशेष शौक है.
व्यवसाय
जंगलों में निवास करने के कारण जड़ी-बूटियों से परिचित हैं. ये लोग धान, दालें, तिलहन तथा सव्जियों की
खेती करके जीविकोपार्जन करते हैं. भेड़-वकरियाँ भी पालते हैं.
भाषा-बोली
राजी जनजाति के लोग घरों में बोलचाल में 'मुण्डा भाषा बोलते हैं. घर के बाहर ये लोग कुमाऊँनी भाषा वोलते हैं. इनकी भाषा में तिब्वती तथा संस्कृत भाषा की वहुलता रहती है. राजियों में वधू को क्रय करके विवाह किया जाता है. महिलाओं को पुनर्विवाह का अधिकार होता है.
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